Sunday, 27 September 2015



                           जनता की सम्प्रभुता शक्ति का क्षेत्राधिकार सीमित 


 राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के अधिकतर परिक्षा के समान्य अध्धयन में पूछे जाने वाला सवाल की भारत में संप्रभुता शक्ति किसमें निहित है और इसका उत्तर हम भारत के लोग (जनता) है पर जब संप्रभुता शक्ति के बारे में समझते है तो जो मतलब निकलता है वो ये बताता है  ऐसी शक्ति जिसका उपयोग हर भारतीय नागरिक अपनी इच्छा से कर सकता है उसका उपयोग के लिए आप को किसी के सलाह की जरूरत नहीं पड़ती जो लोकतन्त्र शासन को सर्वोपरि बनाने का पहला हथियार है डॉ. अंबेडकर ने भी यही चीज बताने की कोशिश की और कहा "इस सविधान का आधार जनता है एव इसमें निहित प्राधिकार और प्रभुसत्ता सब जनता से प्राप्त हुई है" जो भारत देश को लोकतान्त्रिक देश में बदलता है
                                                                          चुनाव के शुरू होने के कुछ दिनों पहले जो डॉ. अंबेडकर जी ने जो बताने की कोशिश की थी समझ में आने लगती है, और जैसे ही कोई पोलिटिकल पार्टी सत्ता में आ जाती है तब से जनता की  संप्रभुता शक्ति कि शक्ति छीड़ (कम) होने लगती है और जब तक सत्ता का कार्यकाल पूरा नहीं हो जाता और नई सरकार बनाने की पहल नहीं होने लगती तब तक जनता की संप्रभुता शक्ति छीड़ बानी रहती है और यह भी देखने को मिलता है की  युक्ति-युक्त मांग की पूर्ति के लिए जनता को डंडा भी खाना पड़ता है तब इस भारत देश की आधारशीला कही गई संप्रभुता शक्ति जनता को डंडा पड़ने से नहीं बचा पाती क्या ये सही है
                 यही सब कृत्य सवाल पैदा करते है की भारत की सविधान निर्माता समिति भारत देश को किस तरह की सकल देना चाहते थे आज जैसा भारत है उस तरह या  उससे हटकर ………             

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