Thursday, 5 November 2015


                              सयुक्त मकान ही बचे है सयुक्त परिवार नहीं 

हम सब सयुक्त परिवार के बच्चे है और जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर हम सब सयुक्त परिवार के हिस्सा है एवम हम सब सयुक्त परिवार के लुफ्तो से भली भाती वाकिफ है पर आज सयुक्त परिवार की तस्वीर बदल चुकी है पहले जो सयुक्त परिवार थे वे कुछ इस तरह थे व्यक्तियों के उस समूह को सयुक्त परिवार के रूप में रखा गया जिसमे दो या दो से अधिक पीढ़ियों के सदस्य एक स्थान पर निवास करते है और वे परस्पर किसी न किसी प्रकार से रक्त सम्बंधित होते है एवंम उत्पादन करने वाले सभी साधनो पर परिवार के सभी सदस्यों का समान अधिकार हो तथा जो भी आय हो परिवार की, उसका उपभोग भी सभी के लिए समान हो पर थ्योरी आज के सयुक्त परिवार पर लागु लागू नहीं होती क्योकि आज सयुक्त पत्थर , बालू ,सीमेंट ,मौरंग के बने घर ही बचे हुए है जिसमे परिवार के सदस्य रहते है और समाज कि नजरो में धूल झोंकते है और समाज को दिखाते है की ये सयुक्त परिवार का आयना है पर जो असल में होता नहीं।.
                                                     सवाल तो ये है कि  सयुक्त परिवार की ये तस्वीर किसने बनाई  इस प्रश्न के उत्तर से रूबरू होने के लिए सयुक्त परिवार  के कार्यशैली पर विचार करने के उपरांत ही जाना जा सकता है कार्यशैली पर विचार करने के उपरांत  यह मालूम होता है कि सयुक्त परिवार की  कुछ मुख्य विशेषता जैसे -मुखिया का शासन ने ही सयुक्त परिवार की तस्वीर बदली, मुखिया ने अपने शासन को सर्वोपरि बनाय रखने  के लिए परिवार में रह रहे अन्य सदस्यों को सम्मान देना नहीं सीखा जिस कारण सयुक्त परिवार की तस्वीर बदल गई 
                             सयुक्त परिवार में पैसे की नहीं सम्मान कि बहुत कमी                                 

Friday, 9 October 2015


 नालसा बनाम भारत संघ  के वाद का इम्प्लीमें बढ़ाएगा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की मुस्किले  

अभी भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी मेक इन इंडिया व युवाओ को रोजगार दिलाने की दवा की खोज कर  ही रहे थे कि नालसा बनाम भारत संघ  के वाद का निर्णय ने मोदी जी के संकल्प को कठिन और मुश्किलो भरा बना दिया तथा भारतीय दैनिक अख़बार भी जो बया कर रहे है वो भारतीय युवा शक्ति का छीड़ होता दृश्य को इंगित कर रहा है  क्योकि रोज बहुत से युवा लोग रोजगार के आभाव में आत्महत्या का रास्ता चुन रहे है जो युवा भारत की पहचान को धुधिल कर रहा है तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को बहुमत से भारत की सत्ता सौपने का उद्देश्य में रोजगार भारत का उद्देश्य समाहित था ऐसे में मोदी जी दवरा मेक इन इंडिया व युवाओ को रोजगार दिलाने की दवा की खोज आसान नहीं होगी 

                                              भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा भारतीय जनता से किया गया वादा कि भारत से बेरोजगारी को मिटाना और बेरोजगार जनता को रोजगार मुव्हिया करना, की राह और भी मुस्किल होने वाली है क्योकि सुप्रीम कोर्ट ने एक एहम और न्ययासंगत निर्णय में किन्नरों को (तीसरे लिंग) के रूप में मान्यता दे दी है जिसके दवरा भारत में रह रहे किन्नरो की स्थित सुधार आएगा और सरकारी नौकरी के फार्म  में थर्ड लिंग का ओप्शन होगा जिससे किन्नेर लोग सरकारी नौकरी का फार्म भर सकेंगे और सरकारी पद को प्राप्त कर सकेंगे जिससे किन्नरों की समाज में अच्छी स्थित में लेन में सफल रहने की उम्मीद जताई जा रही है

                                             ये  वाक्या तो सभी ने सुना और कहा होगा गरीबी में आटा गीला आज ये वाक्या भारतीय बेरोजगार जानता पर अप्लाई हो रहा है सोचते हुए हसी आ रही है पर हालत तो यही कह रहे है पर नीरस होने की जरूरत नहीं है बस और मेहनत करनी होगी और सफलता मिलेगी क्योकि हम सबने ये वाक्या भी सुना है और कहा है कि कोशिस करने वाले की कभी हार नहीं होती यानि सफलता मिलती है 



           

Sunday, 27 September 2015



                           जनता की सम्प्रभुता शक्ति का क्षेत्राधिकार सीमित 


 राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के अधिकतर परिक्षा के समान्य अध्धयन में पूछे जाने वाला सवाल की भारत में संप्रभुता शक्ति किसमें निहित है और इसका उत्तर हम भारत के लोग (जनता) है पर जब संप्रभुता शक्ति के बारे में समझते है तो जो मतलब निकलता है वो ये बताता है  ऐसी शक्ति जिसका उपयोग हर भारतीय नागरिक अपनी इच्छा से कर सकता है उसका उपयोग के लिए आप को किसी के सलाह की जरूरत नहीं पड़ती जो लोकतन्त्र शासन को सर्वोपरि बनाने का पहला हथियार है डॉ. अंबेडकर ने भी यही चीज बताने की कोशिश की और कहा "इस सविधान का आधार जनता है एव इसमें निहित प्राधिकार और प्रभुसत्ता सब जनता से प्राप्त हुई है" जो भारत देश को लोकतान्त्रिक देश में बदलता है
                                                                          चुनाव के शुरू होने के कुछ दिनों पहले जो डॉ. अंबेडकर जी ने जो बताने की कोशिश की थी समझ में आने लगती है, और जैसे ही कोई पोलिटिकल पार्टी सत्ता में आ जाती है तब से जनता की  संप्रभुता शक्ति कि शक्ति छीड़ (कम) होने लगती है और जब तक सत्ता का कार्यकाल पूरा नहीं हो जाता और नई सरकार बनाने की पहल नहीं होने लगती तब तक जनता की संप्रभुता शक्ति छीड़ बानी रहती है और यह भी देखने को मिलता है की  युक्ति-युक्त मांग की पूर्ति के लिए जनता को डंडा भी खाना पड़ता है तब इस भारत देश की आधारशीला कही गई संप्रभुता शक्ति जनता को डंडा पड़ने से नहीं बचा पाती क्या ये सही है
                 यही सब कृत्य सवाल पैदा करते है की भारत की सविधान निर्माता समिति भारत देश को किस तरह की सकल देना चाहते थे आज जैसा भारत है उस तरह या  उससे हटकर ………             

Wednesday, 16 September 2015



        अब सविदा की सरकार की जरूरत न कि विश्वास की

समाज परिवर्तनशील है और जब तक मानव सभ्यता का अन्त नहीं होता तब तक सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहेगी और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया  निम्न कारक के दवरा सम्भव होती  है देश की सरकार एवं सामाजिक मानवीय कारण, पर वर्तमान  परिस्थित को जहेम में रखते हुए तुलना की जाए की कौन कारण सामाजिक परिवर्तन में अधिक महत्वपूर्ण है तो हमें अनुमानित होगा की सरकार सामाजिक परिवर्तन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योकि सरकार का काम है राज्य में कानून व्यवस्था को बनाय रखना और यदि कोई ऐसी प्रथा , रूठि  जो राज्य की कानून व्यवस्था में बाधा बनती है तो उसे समाप्त कर राज्य में कानून व्यवस्था को बनाय रखना इसका उदाहरण हम सब को ज्ञात है बाल विवाह , सतीप्रथा का अन्त कर इसे गैर क़ानूनी एवम दण्डनीय अपराध माना गया /
                                                 आज हम सबको आजाद हुए ६७ साल से जादा समय हो गया है और हम सब ने बहुत से बदलाव को समाज में होते हुए देखा है और इसी बदलाव की प्रक्रिया को जारी रखते हुए डिज़िटल इंडिया के कार्य को किया जा रहा है और आशा है की जल्द ही भारत को डिजिटल बनाने का सपना पूरा होगा पर मजेदार बात तो ये है कि आज भी हमारी सरकार के विश्वास पर चुनी जाती है कि ये सरकार जनता के विस्वाश पर खड़ी उतरेगी और यदि सरकार जनता से किये वादे को पूरा नहीं करती तो  जनता को अपना दुर्भाग्य समझ कर फिर विश्वास की सरकार को चुनने के लिए लाइन में लग जाती है आखिर कब तक हम विश्वास का खेल खेलते रहेगे /
                                                 और से बात सत्प्रतिशत सही है कि संविदा ही दायित्व को पैदा करती है जिस प्रकार जब हम कोई गवर्नमेंट नौकरी का फॉर्म भरते है एक डेक्लरेशन साइन करते है की जो मैंने फॉर्म में भरा है वो सही है यदि गलत हो तो कानून कार्यवाही आवेदक पर कि जाए जो सविदा का प्रतीक है और आवेदक के दायित्व का निर्माण करती है ग्रोशियस ने सही ही कहा था की राज्य और जनता के मध्य बढ़ते विरोध को शांत एवंम काम करने के लिए सामाजिक संविदा जरुरी ///////                      

Tuesday, 25 August 2015



              निजता के अधिकार का गला घोटना तो पड़ेगा 

आज वर्तमान में बहुत से NGO यौन उत्पीड़न अपराध पर रोक लगाने , महिला सशक्ति कारण , महिलाओ की स्थित सुधरने तथा  महिलाओ को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम को कर रहे है जो एक अच्छे परिकल्पना को होने को जन्म देता है, यह कहना पड़ रहा है की ऐसे कारिकक्रम तब तक ही अच्छे लगते है जब तक वे किसी स्थान पर चलाए जा रहे हो क्योंकी तब सभी दर्शक कहते है की हम महिलाओ को समाज में सम्मान जनक स्थित में पहुचाएगे और समाज में ऐसा वतावरण का निर्माण करेंगे की जिसमे महिलाओ के जीवन के अनुकूल स्थित हो .
                                           दिक्कत तो वर्तमान न्यूज़ , खबर को  देखने उपरांत पैदा होती है जो यह है की  यौन उत्पीड़न का अपराध का आरोप शिक्षको, और समाज के ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति पर लगाय जा रहे है जिनसे उम्मीद की जाती है की वे एक लोककल्याण करी समाज का निर्माण करे  एक इंशान ही अपराध  को करता है तो इस प्रश्न की गैरंटी की  वो अपराध को नहीं करेगा देगा .
                                                                                       जरा विचार कीजिए की यदि विद्दालय एवम अन्य उपयुक्त स्थानो में मानव कार्यो में पारदर्शिता को ल दिया जाए तो  शिक्षको द्वारा एवम व्यक्ति द्वारा किये जा रहे यौन उत्पीड़न के अपराध को काम करने पर काफी नकेल लगेगी, और जरा एक पीड़िता की नजर से देखे तो बात  समझ में आ रही होगी।                                                    

              अनुभव तो कहता है - आदमी ही आदमी का सर फोड़ता है ।                    

Monday, 20 April 2015


               देश के सबसे बड़े पेपर की कोई एजुकेशन क्वालिफिकेशन नहीं 


 आज तक हमारे सिस्टम में ऐसी व्यवस्था पर जोर ही नहीं डाला कि देश के सबसे बड़े पेपर की कोई एजुकेशन क्वालिफिकेशन को निश्चित किया जाये देश के कुछ बड़े पेपर में निम्न पेपर CM, MLA, MLC, PM, president के पेपर है जिनकी क्वालिफिकेशन समान्यता निम्न है की  इन पेपर को देने वाला व्यक्ति वो भारत का नागरिक हो , उम्र पद के नियमा अनुसार हो , अन्य जो नियम के अनरूप हो भारतीय संविधान के कुछ अनुच्छेद 58-राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए क्वालिफिकेशन ,अनुच्छेद173- राज्य के विधान मंडल की सदस्यता के लिए क्वालिफिकेशन, अनुच्छेद 84- संसद की सदस्यता के लिए क्वालिफिकेशन  को बताता है पर एजुकेशन क्वालिफिकेशन को जगह नहीं देता है
                                                        बात स्पष्ट है की जब हमारे देश के सबसे बड़े पेपर की कोई एजुकेशन क्वालिफिकेशन नहीं और वो देश को चलने में समर्थ है तो क्या देश के तमाम पेपर उदाहरण क्लार्क , चपरासी आदि जिनका काम अपने अधिकारी की सेवा करना , पानी देना , फाइल देना आदि काम के लिए व्यक्ति की  एजुकेशन क्वालिफिकेशन जरुरी है , है तो क्यों
                                                       जब देश के सबसे बड़े पेपर की कोई एजुकेशन क्वालिफिकेशन नहीं है तो आशंका बानी रहती है की एक बिना पढ़ा  व्यक्ति भी देश को चलने की सामर्थ रखता है तो एक बिना  लॉ पढ़ा व्यक्ति निर्णय भी देने की शक्ति रखता है पर वर्तमान में निर्णय देने की शक्ति जज के हाथ में है  और जज के पद के लिए पेपर एवम  क्वालिफिकेशन को निश्चित किया गया है जो उपयुक्त प्रतीत होता है इसी प्रकार देश के सबसे बड़े पेपर की भी  एजुकेशन क्वालिफिकेशन को बनाया जाना चाहिए देश के सबसे बड़े पेपर की   एजुकेशन क्वालिफिकेशन में उम्मीदवार की कुछ ऐसी एजुकेशन क्वालिफिकेशन होनी जरुरी चाहिए जिससे प्रतीत हो की वह देश की रक्षा , विकाश को करने की पूरा सामर्थ है 

                         आतंकवादी संगठन की टोली में जाने से बचे 

पिछले कुछ वर्षो से कभी कभी ये सुनने को मिलता था की किसी व्यक्ति को आतंकवादी संगठन के किसी आदमी द्वारा ब्रेनवाश कर के आतंकवादी संगठन में समलित कर लिया अब बात ये ध्यान देने योग्य है की जब बचपन से ही सभी बच्चो को देश विकाश ,समृद्धि का पाठ एवं  देश विकाश ,समृद्धि करने को बतलाया जाता है तो किसी देश  में आतंकवादी संगठन जैसे संगठन का निर्माण कैसे हो रहा है
                                                                     ये गंभीर प्रश्न है की कोई व्यक्ति कैसे अपने स्वयं के देश का कैसे दुश्मन का  रूप धारण कर लेता है  और कैसे कोई आतंकवादी संगठन का व्यक्ति आतंकवादी संगठन को बढ़ाने के लिए कैसे ब्रेनवाश करते है  लेकिन सोच की दूरदर्शिता से यह कहने में तनिक भी जिझक न होगी की  जब अपने स्वयं के देश को उसी देश के निवासी का उसके विपरीत होना या जाना तो यानि कोई कमी है देश में जिसको उसे के नागरिक ने महसूस किया और अपने स्वयं के देश के विपरीत चला गया देश को उस कमी को दूर करना चाहिये ताकि उसके स्वम के नागरिक देश के दुश्मन न बने 
                                                                         ऐसे तमाम सी घटना तो आप ने अपनी जीवन में बहुत बार सुना होगा की  सगे बेटे ने अपने पिता को मारा , सगे बेटे अपने पिता को घर से बाहर निकला ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि एक  सगा बेटा अपने पिता को कैसे मार एवं घर से कैसे बाहर निकल सकता तो रिजल्ट कई बार ये अता है की पिता के कुछ ऐसे कामो ने उसे अपने पिता का विरोधी बनाया
                                                                         किसी संगठन की मजबूती उसके संगठन के मेम्बर पर निर्भर करती है यदि उसके मेंबर को खत्म किया जाए तो कुछ समय बाद वह संगठन खत्म हो जायगा और इसी तरीके से किसी आतंकवादी संगठन को ख़त्म या छिण किया जा सकेगा इसके लिए किसी आतंकवादी संगठन में जाने से बचे और यकीन मानिये बहुत जल्द हमारी आखो के सामने हमारा हस्ता, खेलता ,सुन्दर, खुशाल देश होगा