Thursday, 5 November 2015


                              सयुक्त मकान ही बचे है सयुक्त परिवार नहीं 

हम सब सयुक्त परिवार के बच्चे है और जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर हम सब सयुक्त परिवार के हिस्सा है एवम हम सब सयुक्त परिवार के लुफ्तो से भली भाती वाकिफ है पर आज सयुक्त परिवार की तस्वीर बदल चुकी है पहले जो सयुक्त परिवार थे वे कुछ इस तरह थे व्यक्तियों के उस समूह को सयुक्त परिवार के रूप में रखा गया जिसमे दो या दो से अधिक पीढ़ियों के सदस्य एक स्थान पर निवास करते है और वे परस्पर किसी न किसी प्रकार से रक्त सम्बंधित होते है एवंम उत्पादन करने वाले सभी साधनो पर परिवार के सभी सदस्यों का समान अधिकार हो तथा जो भी आय हो परिवार की, उसका उपभोग भी सभी के लिए समान हो पर थ्योरी आज के सयुक्त परिवार पर लागु लागू नहीं होती क्योकि आज सयुक्त पत्थर , बालू ,सीमेंट ,मौरंग के बने घर ही बचे हुए है जिसमे परिवार के सदस्य रहते है और समाज कि नजरो में धूल झोंकते है और समाज को दिखाते है की ये सयुक्त परिवार का आयना है पर जो असल में होता नहीं।.
                                                     सवाल तो ये है कि  सयुक्त परिवार की ये तस्वीर किसने बनाई  इस प्रश्न के उत्तर से रूबरू होने के लिए सयुक्त परिवार  के कार्यशैली पर विचार करने के उपरांत ही जाना जा सकता है कार्यशैली पर विचार करने के उपरांत  यह मालूम होता है कि सयुक्त परिवार की  कुछ मुख्य विशेषता जैसे -मुखिया का शासन ने ही सयुक्त परिवार की तस्वीर बदली, मुखिया ने अपने शासन को सर्वोपरि बनाय रखने  के लिए परिवार में रह रहे अन्य सदस्यों को सम्मान देना नहीं सीखा जिस कारण सयुक्त परिवार की तस्वीर बदल गई 
                             सयुक्त परिवार में पैसे की नहीं सम्मान कि बहुत कमी                                 

Friday, 9 October 2015


 नालसा बनाम भारत संघ  के वाद का इम्प्लीमें बढ़ाएगा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की मुस्किले  

अभी भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी मेक इन इंडिया व युवाओ को रोजगार दिलाने की दवा की खोज कर  ही रहे थे कि नालसा बनाम भारत संघ  के वाद का निर्णय ने मोदी जी के संकल्प को कठिन और मुश्किलो भरा बना दिया तथा भारतीय दैनिक अख़बार भी जो बया कर रहे है वो भारतीय युवा शक्ति का छीड़ होता दृश्य को इंगित कर रहा है  क्योकि रोज बहुत से युवा लोग रोजगार के आभाव में आत्महत्या का रास्ता चुन रहे है जो युवा भारत की पहचान को धुधिल कर रहा है तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को बहुमत से भारत की सत्ता सौपने का उद्देश्य में रोजगार भारत का उद्देश्य समाहित था ऐसे में मोदी जी दवरा मेक इन इंडिया व युवाओ को रोजगार दिलाने की दवा की खोज आसान नहीं होगी 

                                              भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा भारतीय जनता से किया गया वादा कि भारत से बेरोजगारी को मिटाना और बेरोजगार जनता को रोजगार मुव्हिया करना, की राह और भी मुस्किल होने वाली है क्योकि सुप्रीम कोर्ट ने एक एहम और न्ययासंगत निर्णय में किन्नरों को (तीसरे लिंग) के रूप में मान्यता दे दी है जिसके दवरा भारत में रह रहे किन्नरो की स्थित सुधार आएगा और सरकारी नौकरी के फार्म  में थर्ड लिंग का ओप्शन होगा जिससे किन्नेर लोग सरकारी नौकरी का फार्म भर सकेंगे और सरकारी पद को प्राप्त कर सकेंगे जिससे किन्नरों की समाज में अच्छी स्थित में लेन में सफल रहने की उम्मीद जताई जा रही है

                                             ये  वाक्या तो सभी ने सुना और कहा होगा गरीबी में आटा गीला आज ये वाक्या भारतीय बेरोजगार जानता पर अप्लाई हो रहा है सोचते हुए हसी आ रही है पर हालत तो यही कह रहे है पर नीरस होने की जरूरत नहीं है बस और मेहनत करनी होगी और सफलता मिलेगी क्योकि हम सबने ये वाक्या भी सुना है और कहा है कि कोशिस करने वाले की कभी हार नहीं होती यानि सफलता मिलती है 



           

Sunday, 27 September 2015



                           जनता की सम्प्रभुता शक्ति का क्षेत्राधिकार सीमित 


 राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के अधिकतर परिक्षा के समान्य अध्धयन में पूछे जाने वाला सवाल की भारत में संप्रभुता शक्ति किसमें निहित है और इसका उत्तर हम भारत के लोग (जनता) है पर जब संप्रभुता शक्ति के बारे में समझते है तो जो मतलब निकलता है वो ये बताता है  ऐसी शक्ति जिसका उपयोग हर भारतीय नागरिक अपनी इच्छा से कर सकता है उसका उपयोग के लिए आप को किसी के सलाह की जरूरत नहीं पड़ती जो लोकतन्त्र शासन को सर्वोपरि बनाने का पहला हथियार है डॉ. अंबेडकर ने भी यही चीज बताने की कोशिश की और कहा "इस सविधान का आधार जनता है एव इसमें निहित प्राधिकार और प्रभुसत्ता सब जनता से प्राप्त हुई है" जो भारत देश को लोकतान्त्रिक देश में बदलता है
                                                                          चुनाव के शुरू होने के कुछ दिनों पहले जो डॉ. अंबेडकर जी ने जो बताने की कोशिश की थी समझ में आने लगती है, और जैसे ही कोई पोलिटिकल पार्टी सत्ता में आ जाती है तब से जनता की  संप्रभुता शक्ति कि शक्ति छीड़ (कम) होने लगती है और जब तक सत्ता का कार्यकाल पूरा नहीं हो जाता और नई सरकार बनाने की पहल नहीं होने लगती तब तक जनता की संप्रभुता शक्ति छीड़ बानी रहती है और यह भी देखने को मिलता है की  युक्ति-युक्त मांग की पूर्ति के लिए जनता को डंडा भी खाना पड़ता है तब इस भारत देश की आधारशीला कही गई संप्रभुता शक्ति जनता को डंडा पड़ने से नहीं बचा पाती क्या ये सही है
                 यही सब कृत्य सवाल पैदा करते है की भारत की सविधान निर्माता समिति भारत देश को किस तरह की सकल देना चाहते थे आज जैसा भारत है उस तरह या  उससे हटकर ………             

Wednesday, 16 September 2015



        अब सविदा की सरकार की जरूरत न कि विश्वास की

समाज परिवर्तनशील है और जब तक मानव सभ्यता का अन्त नहीं होता तब तक सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहेगी और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया  निम्न कारक के दवरा सम्भव होती  है देश की सरकार एवं सामाजिक मानवीय कारण, पर वर्तमान  परिस्थित को जहेम में रखते हुए तुलना की जाए की कौन कारण सामाजिक परिवर्तन में अधिक महत्वपूर्ण है तो हमें अनुमानित होगा की सरकार सामाजिक परिवर्तन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है क्योकि सरकार का काम है राज्य में कानून व्यवस्था को बनाय रखना और यदि कोई ऐसी प्रथा , रूठि  जो राज्य की कानून व्यवस्था में बाधा बनती है तो उसे समाप्त कर राज्य में कानून व्यवस्था को बनाय रखना इसका उदाहरण हम सब को ज्ञात है बाल विवाह , सतीप्रथा का अन्त कर इसे गैर क़ानूनी एवम दण्डनीय अपराध माना गया /
                                                 आज हम सबको आजाद हुए ६७ साल से जादा समय हो गया है और हम सब ने बहुत से बदलाव को समाज में होते हुए देखा है और इसी बदलाव की प्रक्रिया को जारी रखते हुए डिज़िटल इंडिया के कार्य को किया जा रहा है और आशा है की जल्द ही भारत को डिजिटल बनाने का सपना पूरा होगा पर मजेदार बात तो ये है कि आज भी हमारी सरकार के विश्वास पर चुनी जाती है कि ये सरकार जनता के विस्वाश पर खड़ी उतरेगी और यदि सरकार जनता से किये वादे को पूरा नहीं करती तो  जनता को अपना दुर्भाग्य समझ कर फिर विश्वास की सरकार को चुनने के लिए लाइन में लग जाती है आखिर कब तक हम विश्वास का खेल खेलते रहेगे /
                                                 और से बात सत्प्रतिशत सही है कि संविदा ही दायित्व को पैदा करती है जिस प्रकार जब हम कोई गवर्नमेंट नौकरी का फॉर्म भरते है एक डेक्लरेशन साइन करते है की जो मैंने फॉर्म में भरा है वो सही है यदि गलत हो तो कानून कार्यवाही आवेदक पर कि जाए जो सविदा का प्रतीक है और आवेदक के दायित्व का निर्माण करती है ग्रोशियस ने सही ही कहा था की राज्य और जनता के मध्य बढ़ते विरोध को शांत एवंम काम करने के लिए सामाजिक संविदा जरुरी ///////                      

Tuesday, 25 August 2015



              निजता के अधिकार का गला घोटना तो पड़ेगा 

आज वर्तमान में बहुत से NGO यौन उत्पीड़न अपराध पर रोक लगाने , महिला सशक्ति कारण , महिलाओ की स्थित सुधरने तथा  महिलाओ को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने का काम को कर रहे है जो एक अच्छे परिकल्पना को होने को जन्म देता है, यह कहना पड़ रहा है की ऐसे कारिकक्रम तब तक ही अच्छे लगते है जब तक वे किसी स्थान पर चलाए जा रहे हो क्योंकी तब सभी दर्शक कहते है की हम महिलाओ को समाज में सम्मान जनक स्थित में पहुचाएगे और समाज में ऐसा वतावरण का निर्माण करेंगे की जिसमे महिलाओ के जीवन के अनुकूल स्थित हो .
                                           दिक्कत तो वर्तमान न्यूज़ , खबर को  देखने उपरांत पैदा होती है जो यह है की  यौन उत्पीड़न का अपराध का आरोप शिक्षको, और समाज के ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति पर लगाय जा रहे है जिनसे उम्मीद की जाती है की वे एक लोककल्याण करी समाज का निर्माण करे  एक इंशान ही अपराध  को करता है तो इस प्रश्न की गैरंटी की  वो अपराध को नहीं करेगा देगा .
                                                                                       जरा विचार कीजिए की यदि विद्दालय एवम अन्य उपयुक्त स्थानो में मानव कार्यो में पारदर्शिता को ल दिया जाए तो  शिक्षको द्वारा एवम व्यक्ति द्वारा किये जा रहे यौन उत्पीड़न के अपराध को काम करने पर काफी नकेल लगेगी, और जरा एक पीड़िता की नजर से देखे तो बात  समझ में आ रही होगी।                                                    

              अनुभव तो कहता है - आदमी ही आदमी का सर फोड़ता है ।                    

Monday, 20 April 2015


               देश के सबसे बड़े पेपर की कोई एजुकेशन क्वालिफिकेशन नहीं 


 आज तक हमारे सिस्टम में ऐसी व्यवस्था पर जोर ही नहीं डाला कि देश के सबसे बड़े पेपर की कोई एजुकेशन क्वालिफिकेशन को निश्चित किया जाये देश के कुछ बड़े पेपर में निम्न पेपर CM, MLA, MLC, PM, president के पेपर है जिनकी क्वालिफिकेशन समान्यता निम्न है की  इन पेपर को देने वाला व्यक्ति वो भारत का नागरिक हो , उम्र पद के नियमा अनुसार हो , अन्य जो नियम के अनरूप हो भारतीय संविधान के कुछ अनुच्छेद 58-राष्ट्रपति निर्वाचित होने के लिए क्वालिफिकेशन ,अनुच्छेद173- राज्य के विधान मंडल की सदस्यता के लिए क्वालिफिकेशन, अनुच्छेद 84- संसद की सदस्यता के लिए क्वालिफिकेशन  को बताता है पर एजुकेशन क्वालिफिकेशन को जगह नहीं देता है
                                                        बात स्पष्ट है की जब हमारे देश के सबसे बड़े पेपर की कोई एजुकेशन क्वालिफिकेशन नहीं और वो देश को चलने में समर्थ है तो क्या देश के तमाम पेपर उदाहरण क्लार्क , चपरासी आदि जिनका काम अपने अधिकारी की सेवा करना , पानी देना , फाइल देना आदि काम के लिए व्यक्ति की  एजुकेशन क्वालिफिकेशन जरुरी है , है तो क्यों
                                                       जब देश के सबसे बड़े पेपर की कोई एजुकेशन क्वालिफिकेशन नहीं है तो आशंका बानी रहती है की एक बिना पढ़ा  व्यक्ति भी देश को चलने की सामर्थ रखता है तो एक बिना  लॉ पढ़ा व्यक्ति निर्णय भी देने की शक्ति रखता है पर वर्तमान में निर्णय देने की शक्ति जज के हाथ में है  और जज के पद के लिए पेपर एवम  क्वालिफिकेशन को निश्चित किया गया है जो उपयुक्त प्रतीत होता है इसी प्रकार देश के सबसे बड़े पेपर की भी  एजुकेशन क्वालिफिकेशन को बनाया जाना चाहिए देश के सबसे बड़े पेपर की   एजुकेशन क्वालिफिकेशन में उम्मीदवार की कुछ ऐसी एजुकेशन क्वालिफिकेशन होनी जरुरी चाहिए जिससे प्रतीत हो की वह देश की रक्षा , विकाश को करने की पूरा सामर्थ है 

                         आतंकवादी संगठन की टोली में जाने से बचे 

पिछले कुछ वर्षो से कभी कभी ये सुनने को मिलता था की किसी व्यक्ति को आतंकवादी संगठन के किसी आदमी द्वारा ब्रेनवाश कर के आतंकवादी संगठन में समलित कर लिया अब बात ये ध्यान देने योग्य है की जब बचपन से ही सभी बच्चो को देश विकाश ,समृद्धि का पाठ एवं  देश विकाश ,समृद्धि करने को बतलाया जाता है तो किसी देश  में आतंकवादी संगठन जैसे संगठन का निर्माण कैसे हो रहा है
                                                                     ये गंभीर प्रश्न है की कोई व्यक्ति कैसे अपने स्वयं के देश का कैसे दुश्मन का  रूप धारण कर लेता है  और कैसे कोई आतंकवादी संगठन का व्यक्ति आतंकवादी संगठन को बढ़ाने के लिए कैसे ब्रेनवाश करते है  लेकिन सोच की दूरदर्शिता से यह कहने में तनिक भी जिझक न होगी की  जब अपने स्वयं के देश को उसी देश के निवासी का उसके विपरीत होना या जाना तो यानि कोई कमी है देश में जिसको उसे के नागरिक ने महसूस किया और अपने स्वयं के देश के विपरीत चला गया देश को उस कमी को दूर करना चाहिये ताकि उसके स्वम के नागरिक देश के दुश्मन न बने 
                                                                         ऐसे तमाम सी घटना तो आप ने अपनी जीवन में बहुत बार सुना होगा की  सगे बेटे ने अपने पिता को मारा , सगे बेटे अपने पिता को घर से बाहर निकला ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि एक  सगा बेटा अपने पिता को कैसे मार एवं घर से कैसे बाहर निकल सकता तो रिजल्ट कई बार ये अता है की पिता के कुछ ऐसे कामो ने उसे अपने पिता का विरोधी बनाया
                                                                         किसी संगठन की मजबूती उसके संगठन के मेम्बर पर निर्भर करती है यदि उसके मेंबर को खत्म किया जाए तो कुछ समय बाद वह संगठन खत्म हो जायगा और इसी तरीके से किसी आतंकवादी संगठन को ख़त्म या छिण किया जा सकेगा इसके लिए किसी आतंकवादी संगठन में जाने से बचे और यकीन मानिये बहुत जल्द हमारी आखो के सामने हमारा हस्ता, खेलता ,सुन्दर, खुशाल देश होगा              

 
 अरे हमारा शिक्षा का पाठ्क्रम भी तो हमें कमजोर बनाने में है 55%  जिम्मेदार 

अधिकांश गोवेर्मेंट एग्जामिनेशन में जब विधार्थी बैठता है तो यह अनुभव करता है की उसमे अधिकांश  ऐसे प्रश्न भी आते है जिनके पढ़ने की प्रैक्टिस उसने बहुत सालो पहले उसके शिक्षा पाठ्क्रम ने छुड़वा दी है अभी बात सही से समझ में नहीं आ रही होगी अब आप जरा सोचिये एक बच्चे के जीवन के शिक्षा पाठ्क्रम के बारे में  क्लास 9th तक विद्धार्थी  को  सभी शिक्षा के क्षेत्र में पढ़ने की आदत डलवाई जाती है और वह पढ़ाई करता  है और पेपर देकर पास होकर  आगे अगली क्लास में जाता है यानि 10th क्लास में जहा वो अपने पसंद के पढ़ाई वाले क्षेत्र में पढ़ाई करता है और पास हो कर  11th में जाता है  जहा उसे निम्न शिक्षा के क्षेत्र में से एक क्षेत्र चुनने को दिया जाता है यानी  (आर्ट , मैथ , कोम्मेर्स) में से एक को चुन कर वह पढ़ाई करता है और पास होकर ग्रेजवशन के लिए पहुचता है और फिर से वो मन पसंद पाठ्क्रम में एडमिशन लेता है  पढ़ाई करता है और पास होता है और उसके बाद वो गवर्मेंट के एग्जाम पेपर  को देता  है जहा उसे पता चलता है की ऐसे भी प्रश्न पेपर में आते है जिनको उसने 9th क्लास के बाद उसको  शिक्षा पाठ्क्रम ने छुड़वा दिया है जवाब बिलकुल स्पष्ट है जब एक बार शिक्षा पाठ्क्रम विद्धार्थी को मौका देता है की वो अपने पसंद का पाठ्क्रम चुने और पढ़ाई करे
                                                                ऐसे में सवाल ये उठता है की  शिक्षा पाठ्क्रम चयनित करने वालो को जब मालूम होता है की जब विद्धार्थी को पाठ्क्रम चुनने को दिया जाता है तो  जब वे अधिकांश गोवेर्मेंट एग्जाम को देगा तो उस समय कंडिडेट को सब आना चाहिए हर  शिक्षा पाठ्क्रम  क्षेत्र में  तभी वो  गोवेर्मेंट एग्जाम पास कर पायेगा तो ऐसे में शिक्षा पाठ्क्रम चयनित बोर्ड क्यों विद्धार्थी को शिक्षा पाठ्क्रम चुनने का मौका क्यों देता है आज भी विद्धार्थी को पाठ्क्रम चुनने का मौका दिया जाता है
                                                                  अब प्रश्न ये है की या तो सभी गोवेर्मेंट एग्जामिनेशन में भी सब्जेक्ट चोइस के अनुसार पेपर का तरीका लाया जाय और अन्य शिक्षा पाठ्क्रम से प्रश्न ना दिए जाय और उसी एक शिक्षा पाठ्क्रम के आधार पर नियुक्ति करे या फिर विद्धार्थी को कोई शिक्षा पाठ्क्रम को चुनने का कोई मौका 12th क्लास तक न दिया जाये क्योंकी जब वो अधिकांश गोवेर्मेंट एग्जामिनेशन को देगा तो वह  उससे सब शिक्षा पाठ्क्रम से प्रश्न पूछे जाएगा  जब एक बार किसी सब्जेक्ट की पढ़ने की आदत छूट जाती है तो बच्चा , उसके दवरा छोड़े गए शिक्षा पाठ्क्रम में वह कमजोर महसूस करता है और कोचिंग का सहारा लेने पर मजबूर हो जाता है या रटने की क्रिया का प्रयोग करता है क्यों की उसने  शिक्षा पाठ्क्रम को चुना और पढ़ाई की। ....   

Sunday, 19 April 2015



                               
         विशेष अवसर पर ही जहम में आती है जनता  एवं उनके दुःख 

 आज भी हम सब को याद होगा वो चुनाव का महीना जब हम सब चुनावी बयार में शामिल हुए और  फिर से जनता के विकास का एजेंडा, एवं पूर्व सरकारी कार्यकाल में हुए जानता के दुःख को जनता के सामने रख कर सत्ता की बाग़ डोर को समाहला और जैसे जैसे चुनाव की बयार ख़त्म होती है वैसे वैसे जनता एवम उनके दुःख भी धुधील होने लगते है और यह लगता है की फिर आने वाली  चुनावी बयार में फिर जनता नजर आएगी और वर्तमान में किसान प्राकर्तिक आपदा का कहर के जख्म का दर्द को सहने की कोशिस कर रहे है और 19/4/2015 के अमर उजाला न्यूज़ पेपर की खबर 2136 करोड़ का बीमा,141 करोड़ प्रीमियम पर किसानो को मिले सिर्फ 1.65 करोड़ ,यह यकीन दिलाती है की आने वाले चुनाव में राजनितिक पार्टीया ये सवाल जनता के सामने  रखेगी और राज्य की सत्ता को हासिल करने का प्रयास करेगी    
                                                        बात समझ में नहीं आती की जब हम सभी को यह पढ़ाया एवं बताया जाता है की भारत एक कृषि प्रधान देश है यानि देश कि कुल सकल आय में कृषि क्षेत्र  से प्राप्त होने वाली आय  का देश कि कुल सकल आय में अंन्य आय के क्षेत्र से अधिक आय की प्राप्ति कृषि क्षेत्र से होती है और दर्शय तो यह भी साहमने अ रहा है की धीरे धीरे ग्रामीण लोगो जो कृषि कार्य करते है वे भी शहर में रहना और काम करने की रूचि लेने लगे है यह एक कृषि प्रधान देश के नजरिये से सही घट नहीं  रहा इसकी जिम्मेदार सरकार की  ही तो  है क्योंकी आप ने कृषि प्रधान  क्षेत्र में  क्या ऐसा काम किया जो कृषि कार्य को बढ़ावा दे आज भी बहुत से किसान सही समय पर सिचाई एवं जोताई की समस्या के जरूर जूझ रहा है और जब कृषक विभिन्न समस्या का सामना करके जब फसल को तैयार करता है तो बहुत बार फसलो को प्राकर्तिक आपदा का सामना करना पड़ता है ऐसी स्थित में सरकार को उनको  समाहलना होता है की  उनका मनोबल न टूट सके उसके लिए आकस्मिक निधि से उनकी मदत करने के लिए तुरंत आगे आना चाहिए न कि अन्नय देश की खुशहाल वादियों का लुफ्त ले मै  ये नहीं कहता की आप अन्नय देश की खुशहाल वादियों का लुफ्त न ले लेकिन इतना तो अंदाजा होता ही है की कब ख़ुशी में शामिल होना है और कब  दुःख में हाल ही में    उत्तर प्रदेश में प्राकर्तिक आपदा के कारण हुई कृषि क्षेत्र में हुई हानि की वजह से कई किसानो ने आत्महत्या कर ली  और ये समस्या थम जाएगी यकीन से नहीं कह सकते ऐसे में सरकार उनको आर्थिक सहायता दे और किसानो के प्रति सहायक की छवि  बनाए
                                                                 प्रश्न यह भी है कि किसानो ने आत्महत्या का हि रास्ता क्यों चुना क्या उनको लगता था की सरकार मदत नहीं करेगी उससे बड़ा प्रश्न यह भी उठता है की उनके मन में सरकार की इतने गन्दी इमेज कैसे आई सरकार के किस काम ने उनके मन में सरकार को सहयोगी न समझ कर दुश्मन की इमेज  बनादी जिसके चलते उन्नोहने सरकार को अपनी परेसानी को बताना सही नहीं समझा और आत्महत्या का रास्ता चुनना सही समझा यह  लोककल्याणकरी राज्य के लिए अच्छे संदेश नहीं है रुकिए ये भी तो जानिए कि  ऐसा मेरे मन में इसलिए  क्योंकि मै भी जनता का एक व्यक्ति हु और  मुझे भी पढ़ाया गया है की भारत एक कृषि प्रधान देश है

Wednesday, 8 April 2015


                                  अब तो झाडू भी बोलने लगी 

झाड़ू भी मानव समाज में बोलती  है पर इसकी बोली को मानव अपने कानो से डायरेक्ट नहीं सुन सकता है  तथा  झाड़ू मानव को  मानवता  का पाठ पढाती है अब आप के मन में बहुत से सवाल उत्पन होने लगे होगे की झाड़ू कहा बोलती है और  मानवता का  पाठ  कैसे बता सकती है मानवता का पाठ तो आम तौर पर एक सामाजिक कार्यकरता या एक इंसान बताता है तो यह आपका भ्रम है अब ये जानते है की कैसे झाड़ू बोलने का काम करती है और कैसे मानवता का पाठ उच्चारित करती है झाड़ू की बोली को सुनने के लिए आप को झाड़ू के काम को समझना होगा  आम तैर से झाड़ू समाज में , घर में गंदगी को साफ करने के काम में लाई जाती है मोटा-मोटा झाड़ू  का काम गंदगी को दूर कर स्थान को सुन्दर बनाना है  तथा झाड़ू लगने के बाद आपको झाड़ू लगा स्थान अच्छा (मनभावक) लगने लगता है और आप उस झाड़ू लगे स्थान पर जाना , रहना , समय बिताना  पसंद करते है
                   हम भारत के ऐसे समाज में रहते है जहा बहुत सी सामाजिक गंदगी दिखती है उन गंदगी को हम कुछ इस प्रकार से जानते है जातिवाद , छुवाछुत , ऊच- नीच , समानता असमानता,मै की भावना  आदि  और इन  सामाजिक गंदगी पर झाड़ू लगन बहुत जरूरी है  अभी तक इस सामाजिक व्याप्त गंदगी पर सरकार ने कानून बनाकर  इस सामाजिक गंदगी को साफ़ करने की कोशिश की लेकिन अभी तक पूर्ण रूप से साफ़ करने में सफल नहीं हो पाई है क्योकि आप सब का पूरी तरह सहयोग नहीं मिल सका अब आप सोचे की जब  स्थानो , घरो  में झाड़ू नहीं लगती तो हम वह आना-जाना , उठना - बैठना नहीं पसंद करते है तो इन सब सामाजिक भुरइयो के होते हुए आप कैसे समाज में रह पा रहे है और दूसरे समाज के लोग आप के समाज को क्यों पसंद करे  और क्यों आपके  समाज में आये 
                               बात सिर्फ  इतनी है की जब हम गंदगी  को पसंद नहीं करते है तथा गंदगी को  झाड़ू लगा कर दूर करते है और स्थान को  सुन्दर बना लेते है तो हम सामाजिक गंदगी को  भी दूर करके अपने समाज को अच्छा बना सकते है केवल उसके लिए हमें इस विचारधारा में झाड़ू की कही बात को अपनाकर कर  सकते है  इस  बात का प्रूफ कि हमारे समाज में अनेक सामाजिक गंदगी है उसके परपेच्छ में ये  व्याक्या  तो याद ही होगा की जब अमेरिका के राष्ट्रपती हमारे समाज में आये थे तो वे जब अपने देश गई तो वहा जब हमारे समाज के बारे में पूछा गया तो उनोहने कहा था कुछ इस प्रकार की यदि गांघी  जी आज जिन्दा होते तो वो अपने समाज की ये हालत देख कर मर जाते यह व्याक्या अमेरिका के राष्ट्रपती उनोहने हमारे समाज में मौजूदा सामाजिक गंदगी को देख कर ही  कहा था जिसके जिम्मेदर केवल हम सब है अब इस सामाजिक गंदगी को दूर करने का काम भी हमारा है दूसरे का  नहीं         
                        झाड़ू अपने काम एवं उसके उपयोग उपरांत  निकलने  वाले परिणाम से समाज में  बोलती रहती है पर इंसान है की उसकी आवाज को अनसुना करता रहता है अभी भी समय बाकि की हम झाड़ू की   आवाज को सुने और अपने समाज में व्याप्त सामाजिक गंदगी को दूर करे ताकि एक ऐसे समाज का निर्माण हो जिसमे सामाजिक गंदगी नाहो  और सभी अन्य समाज हमारे समाज में आने के लिए ललित हो और समाज के व्यक्तियो  में मन से आपस में भाई चारा हो बस हमें झाड़ू ने क्या बोला उसके अनुसार कार्य करना है और यकीन मानिये यदि हम झाड़ू की कही बात को अपनाते है तो हमारे समाज से सुन्दर , खुशाल समाज और कही नहीं होगा और हा रुकिए आज भी झाड़ू अपनी आवाज को समाज में प्रसारित कर रही है ……           


 

Sunday, 8 March 2015


 आकाश यादव के  वयक्तित्व (प्रोस्नालिटी) के शब्दों  पर  प्रकाश एक  साक्षात्कार दवारा आइए जानें

  मेरा नाम अविनाश है मैंने अपने सहपाठी आकाश के वयक्तित्व (प्रोस्नालिटी) के  चित्रण  पर  प्रकाश एक  साक्षात्कार द्वारा किया तथा उनके वयक्तित्व से मै परचित  हुवा जिसे मै आप के स्मच्छ इस प्रकार  ब्या करने की  कोशिश रहा हु  हम दोनों लखनऊ यूनिवर्सिटी के MJMC के स्टूडेंट है  हम दोनों यूनिवर्सिटी में ही मिले और  पहली बार मैंने आकाश से  लखनऊ यूनिवर्सिटी  में ही मुलाकात एवं बात कि वैसे

 लखनऊ यूनिवर्सिटी के MJMC के स्टूडेंटस आकाश यादव को सकल एवं नाम से जानते होगे मै भी आकाश यादव से यूनिवर्सिटी में मिला और कुछ समय मैंने उनसे बात की और जब मै उनसे बाते  कर रहा था तो उनोहने कुछ  एसी   बातो  का जिक्र किया जो बहुत अच्छी थी जो जनहित नजरिया से ओत -प्रोत थी जिसके उपरांत मैंने निश्चित किया की  मै थोड़ा टाइम लेकर उनसे कुछ अधिक देर तक बात करके उनकी प्रोस्नालिटी को जानने   इच्छा बहुत थी मैने इंतजार तो किया और वो  इच्छा  ख़त्म हुवा और वो मुझसे मिले और मैने उनसे निम्न चीज जाने जो मै  आप के समच्क्ष लिखनी द्वारा व्यक्त कर रहा हू  ------------------  
Q - मैंने पूछा कुछ  अपने बारे में बताइये …             
A - उनोहने इस प्रश्न का  उत्तर  कुछ इस प्रकार ब्या किया   उनोहने कहा की मेरा जनम लखनऊ में हुवा था और मेरी शिच्छा CMS में हुई है और कहा की मेरी पठाई में मेरे मम्मी पापा का पूरा योगदान है उनोहने कभी भी मेरी पठाई को टूटने नहीं दिया  जिससे मई पठ सका और सही गलत का फैसला कर सकता हु  और मेरी  शिच्छा का  बैकग्राउंड मैथ था  तथा मैंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से BSC अच्छो नंबर से पास किया है

Q- आप अपने पसंद नापसंद के बारे में बताइये ……
A-  उनोहने इस प्रश्न का  उत्तर  कुछ इस प्रकार ब्या किया  उनोहने कहा की मुझे बाहर का खाने नहीं पसंद है घर का खाना पसंद है , फिल्म देखना , मैच खेलना ,घूमना ,  नई  जगह पर जाना , जानवर के प्रति दयाभाव , जानवर को पलना  पसंद है .
Q- आप कब नराज होहे है नराजगी की कोई खास वजह ……
A- उनोहने इस प्रश्न का  उत्तर  कुछ इस प्रकार ब्या किया की मै अपने ऊपर नाराज होता हु क्योकि जब मुझे कोई भला भूरा कहता है तो यानी मेरे अंदर कोई भूरा वयक्तित्व  है जिसे मै अभी दूर नही कर पाया इसी को लेकर मै खुद से नाराज  खुद से नाराज होता हु , और नाराजगी का कोई विशेष टाइम नहीं है . और मै अपने भूरे वयक्तित्व को दूर करने प्रयास करता रहता हूँ     

Q-आप ने  जब BSC  तो आप ने MSC में एडमिशन लेने के बजाए  आप ने MJMC में क्यों एडमिशन लिया कारण क्या है ……
 A उनोहने इस प्रश्न का  उत्तर  कुछ इस प्रकार ब्या किया उनोहने  दो रूप  में पहला  प्लेसमेंट MJMC कऱने के बाद मिल जाता है बच्चो  को और दूसरा रूप यह बताया की समाज में बहुत से भूरिया व्याप्त है वर्तमान समय मे जिसे दूर करना बहुत जरूरी है यदि  हम लोककल्लाणकरी  राज्य का निर्माण करना चाहते है तो जिसके लिए मैंने MJMC को चुना .

 Q- आप को कौन कौन सी भूरिया दिखती है कुछ स्पष्ट कीजिये  ……
 A- उनोहने इस प्रश्न का  उत्तर  कुछ इस प्रकार ब्या किया उनोहने कहा की हमारे संविधान एवं हमारी व्यवस्थापिका ने लोगो के कल्लाण बहुत अच्छे  अच्छे कनून नियम बना रख्खे है बस उन कनून नियम का सही से एवं समय से पालन होने लगे तो लोककल्लाणकरी  राज्य का निर्माण  हो जाएगा जो मैं  MJMC में पढ़ाई करके करना चाहता हु .
Q-  आप  ने अपने विचारअनुरूप  कौन सा काम किया उस पर प्रकाश डाले …।
A-   उनोहने इस प्रश्न का  उत्तर  कुछ इस प्रकार ब्या किया   उनोहने कहा की मै अभी पूर्ण रूप से तो समाज सेवा नहीं की है लकिन मै  वर्ष भंडारा करते हु जिसमे सभी व्यक्ति को निशुल्क भोजन की व्यवस्ता होती है अभी मै इस रूप में समाज सेवा कर रह हु

Q-  आप बिना  MJMC किये  भी तो लोककल्लाणकरी  राज्य का निर्माण में अपना सहयोग  सकते थे ....
A-  हा मै  कर सकता हु पर मेरी बात को जनता तक पहुचने के लिए मीडिया या न्यूज़ पेपर का सहयोग चाहिए।
Q-  आप यकीन से  कैसे कह सकते की मीडिया करेप्ट नहीं है ……।
A-  उनोहने इस प्रश्न का  उत्तर  कुछ इस प्रकार ब्या किया   उनोहने कहा की मै ये नहीं कह सकता की मीडिया करेप्ट लेकिन  उसका उद्देस्य है  लोककल्लाणकरी  राज्य के  निर्माण में सहयोग करना उनके इस उद्देस्य में मै  सहयोग करू यदि मुझे यकीन हो जाऐगा मीडिया करेप्ट  है तो मै  इसका विरोध में सहयोग करुगा
 Q- आप पत्रकार के रूप में किस फील्ड में जाना चाहेंगे …। 
  A-   उनोहने इस प्रश्न का  उत्तर  कुछ इस प्रकार ब्या किया   उनोहने कहा की मै पोलिटिकल फील्ड में जाना चाहुगा
           उपरोक्त वार्ता लाब के उपरांत यह कहने में कोई सक नहीं है की आकाश की एक अच्छी वयक्तित्व के   व्यक्ति है जिनकी भावना जनहित भाव  से ओत -प्रोत से भरी हुई है 


Monday, 16 February 2015



               सरकार को संविदा पर कार्यकाल सौपना चाहिए 

राज्य में कोई नई सरकार बननी होती है तो विभिन्य पोलिटिकल पार्टीया लोककल्याणकारी एजेंडा को जनता से  परचित  राते  है  और  इसी  तरह  अन्य पॉलिटिकल पार्टीया भी अपने अपने एजेंडे  को जनता के सामने रखती है जो सभी  लोककल्याण  राज्य के निर्माण की  तरफ जोर देते है और इन्ही एजेंडे को देख कर कोई  पॉलिटिकल पार्टी को 5 वर्ष के लिए राज्य की कमान जनता द्वारा  दे दी जाती है और राज्य की कमान  सम्हाल रही पोलिटिकल पार्टी पर जनता विश्वास लगाय रहती है की जैसा पार्टी ने एजेंडा दिया है उस तरह काम भी करेगी यदिवर्ष बाद  वो पोलिटिकल पार्टी यदि सरकार बनने से पहले दिए गए वादा (एजेंडे) को पूरा नहीं करती तो जनता की नजरो में लोककल्याणकारी  सरकार की छवि  बिगड़ती है

                 चुनाव के पहले जो आप को  कमी राज्य में दिख रही थी वो कमी चुनाव के बाद भी दिखनी चाहिए , सरकार की इन कमियों को सरकार बानाने वाली पोलिटिकल पार्टी को संविदा पर रख कर ही जनता के प्रति बिगड़ी सरकार की छवि को ठीक किया जा सकता है क्योकि अभी तक जनता तुक्का  लगा रही है की जो सरकार रही है वो विका  करेगी कि नहीं जानता को पता नहीं है   
क्योकि सरकार जनता को कोई सेयोरटी नहीं देती है   जब सरकार संविदा पर बनाई जाएगी तो उसकी जिम्मे दरी जनता कर प्रति  जरूर बन  जाएगी क्योंकी सरकार को मालूम होगा की जब वह एजेंडा को पूरा नहीं  करेगी तो उसे जनता को कम्पन्सेशन देना होगा  जिससे राजनीतिक पार्टी द्वारा दिए  गये वादे  को पूरा करना आवश्यक  हो जायेगा  किस्सा तो सुना ही होगा तालिया दोनों हाथो से बजती है बात यह है की जनता  सरकार दोनों को एक दूसरे पर विस्वास होना चाहिए
                        आप ने जिंदगी में ऐसा बहुत बार देखा एवं सूना  होगा की जो वादे सरकार करती है उसे पूरा करने के लिए लोग भगवान से प्रथना  करते है बल्कि वादो को पूरा करने का काम उसी का होता है  जो उसे देता है यानि जब हम सरकार को कॉन्ट्रैक्ट  पर लायेगे तो ही सरकार जनता को दिए वादो को पुरा करेगी जिससे सरकार और जनता का एक दूसरे पर विस्वास बना रहेगा   
                                                                             बात  सिर्फ इतने है की जब सरकार जनता का विश्वास नहीं करती को जनता सरकार का  विश्वास किस आधार पर कर ले उदहारण - जब आप बैंक से लोन लेने जाते है तो  लोन  देने से पहले वोह सेयोरटी किसी किसी रूप में आप से मागता है उसके बाद ही लोन देता है ताकि यदि आप बैंक लोन नहीं दे पाय तो वो आप की सेयोरटी जब्त कर लेता है  जाहे गीतने भी वादे करे लोन को चुकाने की बिना सेयोरटी  नहीं देगा बैंक यांनी बैंक को जनता के वादो की कथनी पर विस्वास नहीं है                                                                                          फर्क केवल इतना ही होगा पॉलिटिकल पार्टी अपने एजेंनडे की लिस्ट मे पहले 25 से 50 एजेंनडा बताती थी जब सरकार संविदा पर बनाई जाए गई तो  एजेंनडा 10 से 15  हो जाये  सरकार द्वारा जानता को दिया वाला वादे की लिस्ट में कामी आजाएगी लेकिन खुशी  की यह बात होगी की जो सरकार वादे करेगी उनेह वो 5 वर्ष में पूरा करेगी              
                                                                           सरकार संविदा करने के लिए सच्छम है यह भारतीय  संविधान के अनुच्छेद-299 सत प्रतिशत सही है सोचकर देखिये देश और जनविस्वाश में बदलाओ को और अभी जल्द दिल्ली में हुए मुख्यमंत्री चुनाव में 100 % वोटर्स वोट देने नहीं आये केवल लगभग 63 % ही वोटर्स वोट देने आये  इस तरह हो रही वोटर्स की संख्या में गिरावट को केवल सरकार को संविदा पर लाकर दूर  किया जा सकता है और यकीन मानिए सोने की चिड़िया वाला वही सुनहरा हिंदुस्तान एक बार फिर हम सबकी नजरों के सामने होगा